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बुधवार, 10 दिसंबर 2025

सेंटर फॉर साइट मुरादाबाद ने शुरू की एडवांस्ड सर्जिकल रेटिना सर्विसेज, जानी-मानी रेटिना स्पेशलिस्ट डॉ. उपासना सिंह ने किया जॉइन

सेंटर फॉर साइट मुरादाबाद ने शुरू की एडवांस्ड सर्जिकल रेटिना सर्विसेज, जानी-मानी रेटिना स्पेशलिस्ट डॉ. उपासना सिंह ने किया जॉइन

मुरादाबाद : भारत की प्रमुख सुपर-स्पेशलिटी आई हॉस्पिटल चेन सेंटर फॉर साइट ने मुरादाबाद में अपनी एडवांस्ड सर्जिकल रेटिना सर्विसेज की शुरुआत की है। वेस्टर्न यूपी के लोगों को वर्ल्ड-क्लास रेटिना ट्रीटमेंट उपलब्ध कराने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। इस उपलब्धि को और खास बनाते हुए जानी-मानी विट्रियोरेटिनल सर्जन डॉ. उपासना सिंह सीनियर कंसल्टेंट – विट्रियोरेटिनल सर्विसेज के रूप में टीम में शामिल हुई हैं।


1996 में पद्मश्री प्रो. (डॉ.) महिपाल एस. सचदेव द्वारा स्थापित सेंटर फॉर साइट आज देश के सबसे विश्वसनीय आई-केयर नेटवर्क्स में से एक है, जिसके 90+ सेंटर्स, 30+ शहरों में प्रज़ेंस, 350+ विशेषज्ञ डॉक्टर और लगभग तीन दशक की क्लीनिकल एक्सीलेंस शामिल है। हर साल 15 लाख से ज़्यादा मरीज यहां मोतियाबिंद, रिफ्रैक्टिव सर्जरी, कॉर्निया, ग्लॉकोमा, रेटिना, पीडियाट्रिक ऑप्थैल्मोलॉजी, ओकुलोप्लास्टी और ऑक्युलर ऑन्कोलॉजी जैसी सेवाओं का लाभ उठाते हैं।


मुरादाबाद स्थित सेंटर फॉर साइट में शुरू हुई नई सर्जिकल रेटिना यूनिट डायबेटिक रेटिनोपैथी, रेटिनल डिटैचमेंट, एआरएमडी (ARMD), मैक्युलर होल, एपिरेटिनल मेम्ब्रेन और एडवांस्ड विट्रियोरेटिनल डिज़ीज़ जैसी कॉम्प्लेक्स स्थितियों की डायग्नोसिस व मैनेजमेंट के लिए पूरी तरह सक्षम है। नेक्स्ट-जेन डायग्नोस्टिक्स और कटिंग-एज सर्जिकल टेक्नोलॉजी के साथ अब मरीजों को स्पेशलाइज्ड रेटिना ट्रीटमेंट के लिए बड़े शहरों की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी।


सेंटर फॉर साइट मुरादाबाद की नई टीम में शामिल हो रही हैं डॉ. उपासना सिंह, जो अपनी मज़बूत अकादमिक पृष्ठभूमि, सर्जिकल स्किल्स और पेशेंट सेंट्रिक अप्रोच के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने MBBS गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज मिरज (MUHS) से किया और MS ऑप्थैल्मोलॉजी एमएलएन मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज (KGMU) से। इसके बाद उन्होंने सतगुरु नेत्र चिकित्सालय, चित्रकूट से विट्रियोरेटिनल सर्जरी में फेलोशिप पूरी की—जो भारत के सबसे प्रतिष्ठित रेटिना संस्थानों में से एक है। सेंटर फॉर साइट से जुड़ने से पहले वे ASMC प्रतापगढ़ में असिस्टेंट प्रोफेसर थीं और क्लीनिकल व सर्जिकल ट्रेनिंग में उल्लेखनीय योगदान दे चुकी हैं।


लॉन्च के अवसर पर डॉ. उपासना सिंह ने कहा, “कई रेटिनल बीमारियाँ धीरे-धीरे बढ़ती हैं और समय रहते इलाज न मिले तो परमानेंट विज़न लॉस का कारण बन सकती हैं। मुरादाबाद में सर्जिकल रेटिना सर्विसेज की शुरुआत से अब मरीजों को एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स और स्पेशलाइज्ड सर्जरी अपने ही शहर में उपलब्ध होगी। सेंटर फॉर साइट से जुड़कर मैं सम्मानित महसूस कर रही हूँ और लोगों की सेवा संवेदना, सटीकता और लेटेस्ट सर्जिकल इनोवेशन के साथ करने के लिए तत्पर हूँ।”


सेंटर फॉर साइट ग्रुप ऑफ़ आई हॉस्पिटल्स  के चेयरमैन और मेडिकल डायरेक्टर, प्रो. (डॉ.) महिपाल एस. सचदेव ने कहा, “सेंटर फॉर साइट का लक्ष्य हमेशा से उच्च-गुणवत्ता, नैतिक और सुलभ आंखों की देखभाल उपलब्ध कराना रहा है। मुरादाबाद में सर्जिकल रेटिना सर्विसेज की शुरुआत, जिसका नेतृत्व डॉ. उपासना सिंह कर रही हैं, हमारी इसी प्रतिबद्धता को मज़बूत करती है। इससे हम उन क्षेत्रों तक भी वर्ल्ड-क्लास एक्सपर्टीज़ और टेक्नोलॉजी पहुँचा पा रहे हैं जहाँ इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।”


सेंटर फॉर साइट  मुरादाबाद के मेडिकल डायरेक्टर, डॉ. ललित मोहन ने कहा, “मुरादाबाद के आई-केयर में यह एक महत्वपूर्ण माइलस्टोन है। एडवांस्ड सर्जिकल रेटिना सर्विसेज और डॉ. उपासना सिंह की विशेषज्ञता के साथ अब जटिल रेटिनल बीमारियों से जूझ रहे मरीज समय पर और स्पेशलाइज्ड ट्रीटमेंट हमारे ही शहर में प्राप्त कर सकेंगे। यह पहल हमारी कमिटमेंट को और मजबूत करती है—हर मरीज को करुणा, व्यापक देखभाल और हाई-टेक उपचार प्रदान करना।”


इस नए विकास के साथ, सेंटर फॉर साइट पूरे भारत में एडवांस्ड, नैतिक और उच्च-गुणवत्ता वाली आई-केयर सेवाएँ प्रदान करने के अपने संकल्प को फिर से दोहराता है।

बुधवार, 16 जुलाई 2025

कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी के साथ महिला स्वास्थ्य को मिल रही नई दिशा

कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी के साथ महिला स्वास्थ्य को मिल रही नई दिशाडॉ. सौरभ के. गुप्ता, डायरेक्टर एंड हेड, प्लास्टिक एंड रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, यथार्थ हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा 


महिलाओं के लिए इंटिमेट स्वास्थ्य अब सिर्फ बीमारी या इलाज तक सीमित नहीं रहा। कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी एक ऐसा नया क्षेत्र बनकर उभरा है, जो महिलाओं को न सिर्फ उनकी शरीर को लेकर आत्मविश्वास देता है, बल्कि शारीरिक परेशानी से राहत भी दिलाता है। पहले जिस बारे में बात करने से भी झिझक होती थी, आज उस पर खुलकर चर्चा हो रही है और महिलाएं बेझिझक इलाज का विकल्प चुन रही हैं।

डॉ. सौरभ के. गुप्ता, डायरेक्टर एंड हेड, प्लास्टिक एंड रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, यथार्थ हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा, बताते हैं, “हर महिला को अपने शरीर के बारे में खुलकर बात करने और सही जानकारी के आधार पर इलाज चुनने का अधिकार है। कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी महिलाओं को न सिर्फ राहत देती है, बल्कि उनके आत्मविश्वास और क्वालिटी ऑफ लाइफ को भी बेहतर बनाती है।” 


कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी में वे सर्जरी और ट्रीटमेंट शामिल हैं जो महिलाओं के प्राइवेट अंगों के लुक, आराम और फंक्शन को बेहतर बनाते हैं। इसमें वजायनोप्लास्टी (जो बच्चे के जन्म या उम्र बढ़ने के बाद योनि नलिका को कस देता है), लेबियाप्लास्टी (लैबिया के आकार को सही करना), और हायमेनोप्लास्टी (हायमेन को फिर से बनाना) जैसी सर्जरी शामिल हैं। भारत जैसे देश में जहां शादी से पहले कौमार्य को लेकर अब भी सामाजिक दबाव बना रहता है, वहां कुछ महिलाएं अपनी परिस्थितियों के अनुसार हायमेनोप्लास्टी को भी चुनती हैं। 


सिर्फ सर्जरी ही नहीं, लेज़र वजाइनल रीजुवनेशन जैसी आधुनिक तकनीकें भी अब आसानी से उपलब्ध हैं, जो टिशू की मजबूती, नमी और इलास्टिसिटी को बढ़ाने में मदद करती हैं। खासकर मेनोपॉज़ के बाद जिन महिलाओं को सूखापन या हल्की यूरिन लीकेज जैसी समस्याएं होती हैं, उनके लिए यह काफी फायदेमंद साबित हो रहा है।       

        

बच्चे के जन्म के बाद कुछ महिलाओं को योनि की ढीलापन या स्कारिंग जैसी समस्याएं होती हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित होता है। वहीं कुछ को बढ़े हुए लैबिया की वजह से चलने, साइक्लिंग करने या बैठने में भी परेशानी होती है। इन सब परेशानियों से राहत पाने के लिए महिलाएं अब कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी का सहारा ले रही हैं। यह सिर्फ सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि शारीरिक राहत और मन की संतुष्टि के लिए भी एक जरूरी कदम है। 


शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक अब महिलाएं इन ट्रीटमेंट्स को लेकर जागरूक हो रही हैं। नवविवाहिताएं, माएं, कामकाजी महिलाएं और यहां तक कि बुज़ुर्ग महिलाएं भी इस विकल्प की ओर बढ़ रही हैं। हालांकि अब भी कई महिलाएं इस विषय पर बात करने में संकोच करती हैं। इसलिए जरूरी है कि डॉक्टर सही जानकारी दें, बिना किसी जजमेंट के, ताकि महिलाएं सहज होकर सही फैसला ले सकें। 


कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी कोई फैशन या दिखावे की चीज़ नहीं है, यह एक निजी और महत्वपूर्ण मेडिकल ज़रूरत हो सकती है। किसी भी ट्रीटमेंट से पहले योग्य और अनुभवी सर्जन से सलाह लेना जरूरी है, ताकि सारी संभावनाओं और जोखिमों को समझकर सही निर्णय लिया जा सके। 


जैसे-जैसे जागरूकता बढ़ रही है और समाज की सोच बदल रही है, वैसे-वैसे महिलाएं भी समझ रही हैं कि अपने इंटिमेट स्वास्थ्य को लेकर मदद लेना एक सामान्य और जरूरी कदम है। आत्म-सम्मान, शारीरिक राहत और बेहतर जीवन के लिए यह एक सकारात्मक पहल है, जिसे अपनाने में अब कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

Keeping Your Heart Healthy by Reducing Triglycerides and Cholesterol

Keeping Your Heart Healthy by Reducing Triglycerides and Cholesterol

Lowering cholesterol and triglycerides can stop heart disease before it starts 

By:Dr Bimal Chhajer 

Heart disease remains one of the leading causes of death in India. Out of every 10 million deaths in the country, about a third are due to heart-related conditions. This staggering statistic calls for an urgent need for better heart health awareness. The good news is, many of these deaths are preventable, with one of the most crucial factors being the control of cholesterol levels.

 

Cholesterol is a type of fat that is essential for various body functions. However, problems arise when the levels become too high. For most adults, cholesterol levels should be below 200 mg/dL, but trouble often starts when levels exceed 150 mg/dL. Many people, and even some healthcare professionals, mistakenly believe that cholesterol levels up to 200 mg/dL are safe. This is a misconception that can cost lives. Studies show that once cholesterol surpasses 150 mg/dL, the risk of blockages in arteries increases significantly, setting the stage for heart attacks.

 

Just like we compare prices when shopping, we should aim for the best “deal” when it comes to cholesterol. If given the option, we should aim for levels below 130 mg/dL, as this minimizes the risk of blockages and heart disease. The mindset that “200 is fine” must shift, and the focus should be on keeping cholesterol as low as possible for heart health.

 

While cholesterol gets most of the attention, triglycerides are another significant player in heart disease. When triglycerides rise above 100 mg/dL, they too begin contributing to plaque buildup in the arteries. The ideal target for triglycerides is under 100 mg/dL.

 

High triglyceride levels often come from consuming excessive fats—particularly from sources like oils, dairy, and animal products. However, even seemingly healthy foods like nuts can be problematic for heart patients. Almonds, walnuts, and cashews, while nutritious, are high in fats and should be avoided by those with heart disease. It’s essential to focus on a diet low in fats and oils to reduce the risk of blockages.

 

To combat high cholesterol and triglycerides, the first step is diet modification. Reducing or eliminating animal-based products, high-fat dairy, and oils from the diet can have a profound impact. For those with a genetic predisposition to high cholesterol, these dietary changes are crucial, but medication may also be necessary to bring levels into a safe range.

 

Zero-oil cooking is often recommended for heart patients, but it’s important to ensure that hidden sources of fats, such as nuts, are also minimized. While some physicians may recommend almonds and walnuts as part of a healthy diet, these nuts contain a significant amount of fat and can contribute to higher triglyceride levels, leading to artery blockages.

 

For some individuals, high cholesterol and triglyceride levels are genetically programmed. Even with a perfect diet, the liver may continue to produce excessive cholesterol and triglycerides, increasing the risk of heart disease. In such cases, medications are essential to help reduce these levels and prevent heart attacks.

 

On this World Heart Day, the message is clear: controlling cholesterol and triglycerides is key to heart health. While reducing stress, increasing physical activity, and consuming more fruits and vegetables are all important, the most crucial step is to manage cholesterol and triglyceride levels. Aim for a cholesterol level below 130 mg/dL and triglycerides under 100 mg/dL. Avoid high-fat foods, even those that seem healthy like nuts, and if necessary, consult your doctor about medications to keep your levels in check.

 

By making these changes, we can prevent heart disease and ensure a healthier future for ourselves and our loved ones. Let’s change the way we look at heart health—starting today.

 

(The Author is Director, SAAOL Heart Centre)

सोमवार, 23 सितंबर 2024

अल्ज़ाइमर: बुजुर्गों में बढ़ती चुनौती, सही देखभाल से बेहतर हो सकती है ज़िंदगी

अल्ज़ाइमर: बुजुर्गों में बढ़ती चुनौती, सही देखभाल से बेहतर हो सकती है ज़िंदगी

सोनीपत: अल्ज़ाइमर रोग एक मस्तिष्क विकार है, जो समय के साथ गंभीर होता जाता है। यह मस्तिष्क में प्रोटीन के जमा होने के कारण होता है, जिससे मस्तिष्क का सिकुड़ना और मस्तिष्क कोशिकाओं का धीरे-धीरे मरना शुरू हो जाता है। अल्ज़ाइमर रोग सबसे सामान्य प्रकार का डिमेंशिया है, जो स्मरण शक्ति, सोचने, व्यवहार और सामाजिक कौशल में धीरे-धीरे गिरावट का कारण बनता है।


यह परिवर्तन व्यक्ति की सामान्य रूप से कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, अल्ज़ाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे सामान्य रूप है और यह 60-70% मामलों में योगदान करता है। डिमेंशिया वर्तमान में वैश्विक स्तर पर मृत्यु का सातवां प्रमुख कारण है और वृद्ध लोगों में विकलांगता और निर्भरता के प्रमुख कारणों में से एक है।


मैक्स अस्पताल, शालीमार बाग़ के निदेशक – न्यूरोलॉजी, डॉ. मनोज खनल ने कहा, "अल्ज़ाइमर रोग का समय पर निदान और उपचार इसके प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उचित देखभाल और जीवनशैली में बदलाव रोग की प्रगति को धीमा करने और मरीज की जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। हमारा लक्ष्य है कि हम रोगियों और उनके परिवारों को इस चुनौतीपूर्ण समय में हरसंभव सहायता प्रदान करें।


डॉ मनोज खनल, ट्यूलिप अस्पताल, सोनीपत में हर महीने के हर दूसरे गुरुवार को ओपीडी के लिए भी दोपहर 3 बजे से शाम 4 बजे तक उपलब्ध है।


डॉ. मनोज खनल ने कहा “अल्ज़ाइमर रोग के कई प्रकार होते हैं और इसके जोखिम कारक जैसे उम्र बढ़ने (65 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों में), परिवार में इसके इतिहास का होना, डाउन सिंड्रोम, गंभीर सिर की चोट, खराब हृदय स्वास्थ्य और दीर्घकालिक अवसाद इसके विकास में योगदान कर सकते हैं। इसके लक्षणों में स्मृति हानि, मूड और व्यक्तित्व में बदलाव, वस्तुओं को गलत जगह पर रखना, दैनिक कार्यों को पूरा करने में कठिनाई, शब्दावली में संघर्ष और सामान्य स्थानों में खो जाना शामिल हैं।


इस रोग के निदान के लिए आमतौर पर MRI या CT स्कैन जैसी इमेजिंग तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जो मस्तिष्क के विशेष क्षेत्रों में परिवर्तन का निरीक्षण करने में सहायक होते हैं। उपचार के अंतर्गत दवाओं के माध्यम से लक्षणों का प्रबंधन किया जाता है। मानसिक कार्यों को बनाए रखना, व्यवहारिक लक्षणों का प्रबंधन और रोग की प्रगति को धीमा करना इसका मुख्य उद्देश्य होता है। इसके अलावा, स्वस्थ आहार, बेहतर नींद की आदतें, और दैनिक गतिविधियों की स्थिरता मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। रोगी के लिए सुरक्षित वातावरण बनाना और उकसावे या भटकाव जैसे व्यवहारात्मक मुद्दों से निपटने के लिए विशेष तकनीकों का उपयोग करना आवश्यक होता है।


अल्ज़ाइमर रोगियों की देखभाल के लिए कई सुझाव दिए जाते हैं जैसे रोगी के साथ बहस से बचें, उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि आप उनकी मदद करने के लिए हैं। दैनिक क्रियाओं को नियमित समय पर करें और भोजन छोटे टुकड़ों में दें। स्नान के लिए सुरक्षित उपकरणों का उपयोग करें और ढीले कपड़े पहनाएं। उन गतिविधियों की योजना बनाएं जिनमें उन्हें आनंद आता हो, और उनकी दवाओं के सेवन के लिए रिमाइंडर का प्रयोग करें।

सोमवार, 18 मार्च 2024

किडनी डिजीज से बचने के लिए एक्शन की जरूरत, इलाज से बेहतर है बचाव

किडनी डिजीज से बचने के लिए एक्शन की जरूरत, इलाज से बेहतर है बचाव

फोर्टिस हॉस्पिटल वसंत कुंज में नेफ्रोलॉजी एंड किडनी ट्रांसप्लांट के प्रेसिडेंट और प्रिंसिपल डायरेक्टर के नेतृत्व में द इंडिया सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी ने क्रोनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) पर चल रही देशव्यापी स्टडीज की चौंकाने वाली रिपोर्ट साझा की. रिपोर्ट में ये सामने आया है कि हाल में सीकेडी का असर काफी तेजी से बढ़ा है. ऐसे में इस बीमारी से बचाव के लिए लोगों को अवेयर करने की जरूरत है, साथ ही उन्हें इसके इलाज के लिए उपलब्ध विकल्पों के बारे में जानकारी देने की जरूरत है.

 

पुरानी रिपोर्ट्स में ये बात थी कि सीकेडी सिर्फ 15-20 फीसदी लोगों पर ही असर डालती है लेकिन नई स्टडी से चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. देशभर में करीब 1,50,000 लोगों पर की गई इस स्टडी में 31.3% लोगों में माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया का पता चला, जो सीकेडी का शुरुआती संकेत होता है. इस स्टडी में शामिल लोगों की औसत आयु 57.6 साल थी, जिसमें से 59.1% को डायबिटीज थी. ये डेटा पुरानी रिपोर्ट्स को चुनौती देते हुए ये दर्शाता है कि सीकेडी चुनौतीपूर्ण तरीके से बढ़ रहा है और विश्वभर में ये मौत का 5वां सबसे प्रमुख कारण बनकर उभर रहा है.

 

नेफ्रोलॉजी के क्षेत्र में मशहूर डॉक्टर संजीव गुलाटी ने सीकेडी के बढ़ते पर चिंता जाहिर करते हुए खासकर उन मरीजों का जिक्र किया जो एडवांस स्टेज में पहुंच जाते हैं. स्टडी से ये भी पता चला है कि सीकेडी के बढ़ने में लाइफस्टाइल कारकों का एक अहम रोल है, लिहाजा इससे बचाव के लिए अवेयरनेस और अर्ली डिटेक्शन काफी अहम है.

 

डॉक्टर गुलाटी ने सीकेडी के बारे में जानकारियों के अभाव का भी जिक्र किया, साथ ही ये भी बताया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कैसे गलत सूचनाएं फैलाई जा रही हैं. डॉक्टर गुलाटी ने बताया कि लोगों को साइंटिफिक जानकारियां हासिल करने में चुनौतियां पेश आ रही हैं, खासकर भारतीय लोगों को. किडनी से जुड़ी बीमारियों से बचाव के लिए जरूरी है कि जानकारी के इस गैप को भरा जाए.

 

डॉक्टर गुलाटी ने कहा, ”माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया के लिए कम्यूनिटी स्क्रीनिंग नेशनल किडनी स्क्रीनिंग प्रोग्राम का हिस्सा है. डॉक्टर गुलाटी के कम्यूनिटी सर्वे से इस परीक्षण की सादगी का पता चलता है, जिसमें यूरिन डिपस्टिक का उपयोग पॉइंट-ऑफ-केयर (पीओसी) टेस्ट के रूप में किया जाता है. ये टेस्ट किडनी डैमेज से जुड़े शुरुआती संकेतों को चिन्हित करने, यूरिया और क्रिएटिनिन की वृद्धि तो पहचानने में गेम-चेंजर साबित हो सकता है.

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2024

सर्वाइकल कैंसर के प्रति महिलाओं को जागरूक करना जरूरी

रोहतक: सर्वाइकल कैंसर का रोग यूं तो ठीक किया जा सकता है बावजूद इसके ये भारतीय महिलाओं को होने वाला दूसरा सबसे आम कैंसर है जो कुल कैंसर मामलों का 10 फीसदी है. मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल शालीमार बाग (नई दिल्ली) के डॉक्टरों ने इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों, इससे बचाव के तरीकों और उपलब्ध इलाज के बारे में विस्तार से जानकारी दी.

सर्वाइकल कैंसर, सर्वाइकल कोशिकाओं के अनियंत्रित प्रसार के कारण पैदा होने वाली स्थिति होती है. ये लंबे समय से एक ग्लोबल हेल्थ इशू रहा है. लेटेस्ट लैंसेट स्टडी से पता चलता है कि एशिया में सर्वाइकल कैंसर के मामले सबसे ज्यादा भारत में हैं और कुल मौतों की 23 फीसदी मौतें यहां होती हैं.

मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल शालीमार बाग में सर्जिकल गायनेकोलॉजी ऑन्कोलॉजी विभाग की एसोसिएट कंसल्टेंट डॉक्टर अल्का दहिया ने सर्वाइकल कैंसर के लक्षण, रिस्क फैक्टर, अर्ली स्क्रीनिंग और एचपीवी वैक्सीनेशन की जानकारी देते हुए कहा, ''सर्वाइकल कैंसर एचपीवी (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) के कारण होता है, जो सेक्सुअल संबंधों के कारण होने वाले इंफेक्शन से होता है. लगातार मुंह से गर्भनिरोधक गोलियां खाने, स्मोकिंग करने, एक से ज्यादा सेक्सुअल पार्टनर होने और इम्यूनोसप्रेशन के कारण एचपीवी इंफेक्शन होता है. योनि से खून आना, सेक्सुअल इंटरकोर्स के दौरान दर्द और पेल्विक पेन जैसे लक्षणों की पहचान करना बेहद अहम है. पैप स्मियर और एचपीवी टेस्टिंग के अलावा 10 से 26 साल की लड़कियों को एचपीवी टीका लगवाना सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ एक बड़े सुरक्षा कवच का काम करता है.''

मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल शालीमार बाग में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के वाइस चेयरमैन, चीफ रोबोटिक सर्जरी डॉक्टर सुरेंद्र कुमार डबास ने हाल के वक्त में हुई तकनीकी प्रगति और लेटेस्ट ट्रीटमेंट मॉड्यूल के बारे में जानकारी देते हुए कहा, ''इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर की स्टेज क्या है, मरीज की ओवरऑल हेल्थ क्या है और मरीज की प्राथमिकताएं क्या हैं. शुरुआती स्टेज में आमतौर पर कॉनिजेशन, ट्रैकेलेक्टॉमी और हिस्टेरेक्टॉमी जैसी सर्जरी का विकल्प चुना जाता है. रोबोटिक सर्जरी की प्रगति ने सर्वाइकल कैंसर के इलाज में क्रांति ला दी है, और मिनिमली इनवेसिव तकनीक से सटीक इलाज के विकल्प मिले हैं. रोबोटिक रेडिकल हिस्टेरेक्टॉमी और रोबोटिक ट्रैकेलेक्टॉमी के जरिए टारगेटेड कैंसर टिशू को हटाया जाता है और फर्टिलिटी को संरक्षित किया जाता है.''

मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल शालीमार बाग में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के सीनियर डायरेक्टर डॉक्टर सज्जन राजपुरोहित ने कीमोथेरेपी और टारगेटेड थेरेपी जैसे एडवांस ट्रीटमेंट मॉड्यूल के बारे में बताया. एडवांस स्टेज के मामलों  में कीमो-रेडिएशन इलाज के सबसे विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. कीमोथेरेपी में इंजेक्शन या ओरल मेडिकेशन के जरिए इलाज किया जाता है और बॉडी के अंदर मौजूद कैंसर कोशिकाओं तक पहुंचाया जाता है. जबकि दूसरी तरफ टारगेटेड थेरेपी में कैंसर कोशिकाओं को स्पेसिफिक तरीके से टारगेट किया जाता है और ट्रेडिशनल थेरेपी की तुलना में इसके साइड इफेक्ट्स भी कम होते हैं. इस तरह के एडवांसमेंट से मरीजों को उम्मीद मिली है.''

भारतीय महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर के बारे में जागरूक करने की जरूरत है ताकि वो शुरुआती जांच करा सकें, रेगुलर स्क्रीनिंग कराएं और एचपीवी वैक्सीन जैसे बचाव के तरीके अपना सकें. सर्वाइकल कैंसर के इलाज में जो प्रगति हो रही हैं, वो दुनियाभर की महिलाओं के लिए बेहतर समाधान और स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित करेगी.

सोमवार, 15 जनवरी 2024

सर्दियों में दिल को है खतरा, जानिए कैसे रखें स्वस्थ, :डॉक्टर दीपांकर वत्स

सर्दियों में दिल को है खतरा, जानिए कैसे रखें स्वस्थ, :डॉक्टर दीपांकर वत्स

नोएडा। भारत में हार्ट से जुड़ी बीमारियों की बढ़ती संख्या और इसके साथ ही हो रही मौतों को देखकर गहरी चिंता हो रही है। सर्दियों के सीज़न के आने से हार्ट डिजीज का खतरा भी बढ़ जाता है। तापमान में गिरावट के साथ ही शरीर की ऊर्जा की मांग बढ़ती है, जिसके परिणामस्वरूप लोगों की आदतें बदलती हैं, वे जंक फूड पसंद करते हैं और फिजिकल एक्टिविटी कम हो जाती है, जिससे वजन बढ़ता है और दिल से जुड़ी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

यथार्थ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल ग्रेटर नोएडा में कार्डियोलॉजी के डॉक्टर दीपांकर वत्स ने इस विषय पर विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि “सर्दियों के मौसम में, जो लोग पहले से ही हार्ट डिजीज से पीड़ित हैं, उन्हें तत्काल डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इस सीज़न में, हार्ट संबंधित समस्याएं किसी को भी प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन जो लोग पहले से ही किसी न किसी हार्ट डिजीज से ग्रसित हैं, उन्हें तत्काल डॉक्टर से मिलकर अपने स्वास्थ्य की निगरानी रखनी चाहिए।“

इस मौसम में हार्ट पर क्यों पड़ता है असर: 

1. वाहिकाओं का सिकुड़ना: तापमान में गिरावट के कारण रक्त वाहिकाओं का सिकुड़ना हो सकता है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और हार्ट पर दबाव पड़ सकता है।
2. खाने-पीने की गलत आदतें: सर्दी में अधिक खाना खाना, कैलोरी इंटेक्स बढ़ाना और वजन में वृद्धि करना हार्ट के लिए अच्छा नहीं है।
3. शराब का अधिक सेवन: सर्दी के मौसम में शराब की सेवन में वृद्धि हो सकती है, जिससे हार्ट से संबंधित समस्याएं बढ़ सकती हैं।
4. सांस से जुड़े इंफेक्शन: सर्दी के मौसम में सांस से जुड़े इंफेक्शन का खतरा बढ़ सकता है, जो हार्ट अटैक के लिए रिस्क बढ़ा सकता है।
दिल से जुड़ी समस्याओं के लक्षणों की पहचान बहुत महत्वपूर्ण है। सीने में दर्द, धकधक और असामान्य सांस की परेशानी जैसे लक्षणों को ध्यानपूर्वक लेकर डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

हार्ट अटैक के मैकेनिज़म के बारे में बताते हुए डॉक्टर दीपांकर ने कहा, "जब कोई धमनी तेजी से क्लॉट से ब्लॉक हो जाती है, तो दिल के किसी हिस्से तक ब्लड फ्लो रुक जाता है, जिससे हार्ट अटैक हो सकता है। इस परिस्थिति में, समय पर डायग्नोसिस होना अत्यंत महत्वपूर्ण है ताकि उचित इलाज कराया जा सके और मरीज को सही समय पर मदद मिल सके। समय पर मिलने वाला इलाज हार्ट फंक्शन को सही कर सकता है और मरीज की जीवन संभावनाएं बढ़ सकती हैं।“

हार्ट स्वास्थ्य की रक्षा के लिए यहां दी गई सावधानियों का पालन करना आवश्यक है: 

1. वजन संतुलित रखें: कम कैलोरी फूड, शुगर और मिठाई से बचें और नियमित रूप से एक्सरसाइज करें।
2. रेगुलर एक्सरसाइज: कम से कम 15-30 मिनट डेली वॉक करें और नियमित फिजिकल एक्टिविटी करें।
3. लाइफस्टाइल में बदलाव: शराब और स्मोकिंग से बचें, अधिक पानी पिएं और गर्म कपड़े पहनें।
4. ब्लड प्रेशर: ब्लड प्रेशर की निगरानी रखें और उचित दवाओं का सेवन करें।

डॉक्टरों का कहना है कि लाइफस्टाइल में ये बदलाव सही दिशा में एक कदम है जो हमें अपने दिल की रक्षा के लिए उठाना चाहिए। 

सोमवार, 8 जनवरी 2024

आधुनिक जीवनशैली पीठ दर्द का एक प्रमुख कारण

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ज की आधुनिक जीवनशैली ने कई शारीरिक पेरशानियों और बीमारियों को बढ़ावा दिया है.जिसमें कुछ बीमारियां तो ऐसी हैं जो कि ऑफिस में बैठने के कारण पनपती हैं. घंटों एक ही जगह बैठने से हमारी रीढ़ गंभीर रूप से प्रभावित होती है जिससे पीठ दर्द की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं.

नई दिल्ली स्थित सर गंगाराम अस्पताल के न्यूरो एंड स्पाइन विभाग के निदेशक, डॉक्टर सतनाम सिंह छाबड़ा ने बताया कि, "रीढ़ की हड्डी और पीठ दर्द का सीधा संबंध है. ऑफिस में गलत तरीके से बैठने से, एक ही पोस्चर में लगातार काम करने से और गर्दन को कई घंटों तक एक ही अवस्था में रखने से व्यक्ति की रीढ़ गंभीर रूप से प्रभावित होती है जिससे पीठ में दर्द शुरू हो जाता है. इसके अलावा ज्यादा देर ड्राइव करने से भी रीढ़ प्रभावित होती है, जिससे पीठ में दर्द और अकड़न जैसी समस्याएं होती हैं. ये दर्द पीठ के किसी भी हिस्से में हो सकता है. कुछ ऐसे संकेत हैं जो गंभीर स्थिति को दर्शाते हैं, जिसके लिए व्यक्ति को तुरंत न्यूरोसर्जन से संपर्क करना चाहिए. यदि कोई व्यक्ति उम्र के अनुसार (20 वर्ष से कम या 50 वर्ष से अधिक आयु) पीठ के दर्द का अनुभव करता है, आराम के साथ दर्द कम नहीं होता है, बिना कारण वजन कम हो रहा हो और आंत की समस्या हो तो उसे तत्काल परीक्षण की आवश्यकता है.

डॉक्टर सतनाम सिंह छाबड़ा ने आगे बताया कि, " रीढ़ को प्रभावित होने से रोकना चाहते हैं तो एक मुद्रा में बहुत देर तक खड़े या बैठे न रहें. प्रेस करने, बर्तन धोने व खाना बनाने आदि जैसे कामों के लिए पीठ और गर्दन झुकानी पड़ती है इसलिए अपने शरीर के पॉस्चर पर ध्यान दें.

आज कल स्लिप्ड डिस्क की शिकायत भी आम हो गई है. यदि कमर की डिस्क बाहर निकल आए तो पैरों में कमजोरी हो सकती है या दर्द भी हो सकता है. कई बार बाहर निकली डिस्क इतना दबाव डाल सकती है कि पेशाब में भी रुकावट आती है. हालांकि, यदि इस प्रकार का दर्द पहली बार है तो 10% लोगों में यह केवल आराम करने से ही ठीक हो जाता है और 10% लोगों को सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है.

इसके इलाज के लिए स्पाइनल इंडोस्कोपी जैसी सर्जरी संभव हो गई है, जिसके परिणाम बेहतर होते हैं" एक सक्रिय जीवनशैली के साथ संतुलित आहार और बैठने, चलने और झुकने के दौरान सतकर्ता से रीढ़ की हड्डी संबंधी इन समस्याओं में से अधिकांश को रोका जा सकता है. सबसे पहले दर्द के कारण को पहचानना जरूरी है, जिसके लिए जांच कराना आवश्यक होता है. मामूली दर्द मरहम लगाने और आराम करने से ठीक हो जाता है.

मंगलवार, 14 नवंबर 2023

यथार्थ सुपर स्पेशलिटी अस्पताल नोएडा में रीढ़ के टेढ़ापन का सफल इलाज, एडवांस तकनीक से की गई सर्जरी

यथार्थ सुपर स्पेशलिटी अस्पताल नोएडा में रीढ़ के टेढ़ापन का सफल इलाज, एडवांस तकनीक से की गई सर्जरी

 नोएडा: नोएडा के सेक्टर 110 स्थित यथार्थ सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में रीढ़ के टेढ़ेपन (स्कोलियोसिस) से जुड़ा एक जटिल ऑपरेशन सफलतापूर्वक किया गया. इस केस को कामयाब बनाने में एडवांस तकनीक और डॉक्टरों की विशेषज्ञता ने अहम रोल निभाया. इसे के बारे में लोगों को बताने के लिए एक जागरूकता सत्र आयोजित किया गया.

यथार्थ अस्पताल में स्पाइन एंड स्कोलियोसिस प्रोग्राम के हेड और सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर प्रांकुल सिंघल ने स्कोलियोसिस से पीड़ित कम उम्र के दो बच्चों के जटिल केस के बारे में बताया, जिनका सफल इलाज किया गया. रीढ़ को लेकर ये मिथक भी रहते हैं कि उसकी समस्याओं का इलाज नहीं किया जा सकता है और इसकी सर्जरी से बचना चाहिए. डॉक्टर ने इस तरह की धारणाओं को दूर करते हुए कहा कि स्कोलियोसिस या रीढ़ की समस्याएं इलाज योग्य हैं.

यथार्थ में सफल इलाज पाने वाले ये केस शानदार इलाज और बेहतर तकनीक के जरिए रीढ़ की गंभीर समस्याओं को ठीक करने की अस्पताल की प्रतिबद्धता दिखाते हैं. देश में ऐसे कम ही अस्पताल हैं जहां इस तरह के मुश्किल मामलों में सफलतापूर्वक ट्रीटमेंट दिया जाता है.

केस के बारे में जानकारी देते हुए डॉक्टर प्रांकुल ने कहा, ''13 साल की लड़की की रीढ़ में 36 डिग्री का घुमाव था और साथ ही स्कैपुलर हंप (कंधे के पीछे निकला हुआ हिस्सा) की भी समस्या थी. पोस्चर फ्यूजन और हंप को सुधारते हुए लड़की का सफलतापूर्वक इलाज किया गया. सिर्फ 3 घंटे चली इस सर्जरी में न केवल रीढ़ की हड्डी की समस्या को ठीक किया, बल्कि हंप की परेशानी को भी सुधारा गया. सर्जरी के 7 दिन बाद मरीज को डिस्चार्ज कर दिया गया, जो बेहतर इलाज और तेज रिकवरी के प्रति अस्पताल की प्रतिबद्धता को दिखाता है.''

एक अन्य मामला 14 साल के लड़के का है. इस लड़के की रीढ़ में 90 डिग्री तक टेढ़ापन था, साथ ही कंधा भी पूरी तरह के मुड़ा हुआ था, कंधे का हंप भी ठीक नहीं था. यथार्थ सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की कुशल मेडिकल टीम के नेतृत्व में रीढ़ का टेढ़ापन ठीक किया गया, कंधे का रोटेशन सुधारा गया और हंप भी को भी सुधारा गया. पहले मरीज की तरह ही इस लड़के को भी सर्जरी के 7 दिन बाद बिना किसी परेशानी और फास्ट रिकवरी के साथ डिस्चार्ज किया गया.

*डॉक्टर प्रांकुल ने आगे कहा,* ''एडोलसेंट इडियोपैथिक स्कोलियोसिस (एआईएस) यानी बच्चों की रीढ़ में टेढ़ेपन के मामले अपेक्षाकृत एक सामान्य स्थिति होती है जिसका अच्छी तरह से इलाज किया जा सकता है. इन मामलों के सफल परिणाम रीढ़ की हड्डी और स्केलेटल बैलेंस को बहाल करने की अस्पताल की क्षमता को भी दिखाता है. इससे मरीज के जीवन के फंक्शनल और सामाजिक पहलुओं में काफी सुधार होता है और जीवन को कमजोर करने वाले खतरे कम होते हैं.

गुरुवार, 28 सितंबर 2023

हृदय रोग से बचाव को लेकर हुआ जागरूकता कार्यक्रम

हृदय रोग से बचाव को लेकर हुआ जागरूकता कार्यक्रम

 बहादुरगढ़। वल्र्ड हार्ट डे को लेकर मैक्स अस्पताल शालीमार बाग की ओर से हार्ट अटैक, उसके लक्षणों, कारणों और समय पर इलाज की भूमिका पर एक जन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। अस्पताल के इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी के एसोसिएट डायरेक्टर डा. चंद्रशेखर ने हृदय रोग से बचाव को लेकर जानकारी भी बताई। कार्डियोलाजिस्ट डा. चंद्रशेखर ने भारत में बढ़ रहे दिल के मामलों के बारे में जानकारी दी। 


बहादुरगढ़ के एक होटल में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत में कुल को-मोरबिडिटी और समय से पहले होने वाली मौतों में से कम से कम 50 फीसदी मौतें दिल की बीमारियों के कारण होती हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि हर 4 मौतों में से एक को हल्के लक्षणों की जानकारी न होने की वजह माना जाता है और ये पुरुषों व महिलाओं दोनों में मृत्यु दर का प्रमुख कारण बन जाता है। उन्होंने कहा कि आमतौर पर मरीज शुरुआती लक्षणों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते। जैसे सीने में दर्द, दबाव, या भारीपन (एनजाइना का संकेत), जबड़े, बाएं कंधे, बाहों, कोहनी, या पीठ में दर्द, सांस की तकलीफ (डिस्पेनिया), पसीना, मतली, थकान, हल्का सिर झुकाना, या बेहोशी जैसे लक्षणों को लोग दरकिनार कर देते हैं. हालांकि, दिल के अलग-अलह मरीजों में ये लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। कई मरीज जिन्हें बार-बार हार्ट अटैक आता है या कार्डियोमायोपैथी को पतला करते हैं, ऐसे मरीजों का अंतत: हार्ट फेल हो जाता है। दिल से जुड़ी बीमारियों जैसे जन्मजात दोष, वाल्व समस्याएं, आर्टरी ब्लॉकेज और लाइफस्टाइल डिसऑर्डर जैसी हार्ट समस्याओं में काफी बढ़ोतरी हुई है. लगभग सभी उम्र के लोग चपेट में आ रहे हैं. 
    
एक्यूट कोरोनरी सिंड्रोम (एसीएस), जिसे आम भाषा में हार्ट अटैक कहा जाता है, भारत जैसे विकासशील देशों में एक बड़ी चिंता का विषय बना है। उन्होंने कहा कि हार्ट अटैक के लक्षणों के बाद तुरंत इलाज कराना चाहिए। इससे समस्याएं कम करने में मदद मिलेगी और दिल सुचारू रूप से काम करता रहेगा। हार्ट अटैक और हार्ट फेल से बचने का सबसे बेहतर उपाय स्वस्थ जीवनशैली और खान-पान है जिससे मोटापा भी सीमित रहेगा, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर भी कंट्रोल होगा।

गुरुवार, 29 जून 2023

बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बारे में जानिए सब कुछ

बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बारे में जानिए सब कुछ

बीएलके मैक्स हॉस्पिटल, नई दिल्ली में एसोसिएट डायरेक्टर डॉक्टर पवन कुमार सिंह ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) से जुड़े हर पहलू पर जानकारी साझा की है. बीएमटी वह प्रक्रिया है जिसके जरिए ब्लड और अन्य जेनेटिक बीमारियों का इलाज होता है. ये खराब बोन मैरो को सामान्य बोन मैरो से रिप्लेस करने की प्रक्रिया है.मरीज के बोन मैरो को कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी के जरिए नष्ट किया जाता है और इसके बाद डोनर की स्टेम सेल को ब्लड की तरह सेंट्रल लाइन के जरिए चढ़ाया जाता है.

ब्लड कैंसर, ब्लड सेल्स से जुड़ी जेनेटिक बीमारियां, पाचन से जुड़ी जन्मजात बीमारियां और ऑटोइम्यून से जुड़ी बीमारियों का इलाज बीएमटी से किया जा सकता है.

ऑटोलोगस- इसमें स्टेम सेल्स का स्रोत रोगी खुद होता है. इस तरह के बीएमटी में दो सिद्धांत उपयोग किए जाते हैं. पहला, हाई डोज थेरेपी यानी मायलोमा और रिलैप्स लिम्फोमा जैसी बीमारियों के लिए. एएससीटी का सिद्धांत स्टेम सेल रेस्क्यू के जरिए हाई डोज कीमोथेरेपी होता है. इस बीमारी को लंबे समय तक नियंत्रित रखने के लिए हाई डोज कीमोथेरेपी दी जाती है. दूसरा सिद्धांत है इम्यून सिस्टम को रिसेट करना. इसमें मल्टीपल स्केलेरोसिस, सिस्टमिक स्क्लेरोसिस, डर्माटोमोसिटिस, एसएलई जैसी ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज होते हैं.

एलोजेनिक-इसमें मरीज की बोन मैरो की जगह डोनर की सामान्य बोन मैरो चढ़ाई जाती है. इस तरह की बीएमटी में दो सिद्धांत अपनाए जाते हैं. पहला, ग्राफ्ट वर्सेस ल्यूकेमिया इफेक्ट. एलोजेनिक बीएमटी में मरीज के हेमेटोपोएटिक सिस्टम को डोनर से रिप्लेस कर दिया जाता है और इस प्रक्रिया के जरिए उसे (मरीज को) डोनर से नया इम्यून सिस्टम मिलता है.

रिप्लेसमेंट ऑफ डिफेक्टिव सिस्टम- खराब मैरो के इलाज के लिए इस सिद्धांत का उपयोग किया जा रहा है. एप्लास्टिक एनीमिया, पैरॉक्सिज्मल नॉक्टेर्नल हीमोग्लोबिन्यूरिया (पीएनएच) एक्वायर्ड बीमारियां मानी जाती हैं. रेड सेल्स डिसऑर्डर्स (थैलेसीमिया, सिकल सेल डिजीज), प्लेटलेट डिसऑर्डर, प्राइमरी इम्युनोडेफिशिएंसी डिजीज या पाचन से जुड़ी जन्मजात समस्याएं जेनेटिक बीमारियों में आती हैं. लेकिन इलाज के इस मेथड में जीवीएचडी का खतरा रहता है.

एलोजेनिक बीएमटी के लिए एचएलए (ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन)  जरूरी है. भाई-बहनों में पूरी तरह से मेल खाने वाले HLA डोनर के मिलने की संभावना एक तिहाई है और परिवार के अन्य सदस्यों में लगभग एक फीसदी.

पिछले कुछ वक्त से हाफ मैच डोनर भी असरदार साबित हो रहे हैं. इसके साथ ही डोनर पूल बढ़ा है और अब उन दो तिहाई मरीजों को भी बीएमटी ऑफर की जा सकती है जिन्हें दुर्भाग्य से पूरी तरह मैच डोनर नहीं मिल पाते थे.

वैश्विक स्तर पर वालंटियर रजिस्ट्रेशन के जरिए उन डोनर्स को सेलेक्ट किया  जाता है जिनके एचएलए 9/10 या 10/10 मैच कर जाते हैं.

बीएमटी के लिए मरीज और डोनर, दोनों की फिटनेस स्क्रीनिंग की जाती है. इसके बाद मरीज की कंडिशनिंग रेजिमेन (कीमोथेरेपी ± टोटल बॉडी इरेडिएशन ± इम्यूनोथेरेपी) की जाती है और इसके बाद डे जीरो से डोनर से ली गई स्टेम सेल्स डाली जाती है. इसके बाद 10 से 18 दिन में डोनर की सेल काम करना शुरू कर देती है.

बीएमटी के बाद तत्काल प्रभाव से इंफेक्शन (बैक्टीरियल और फंगल), ब्लीडिंग, रिजेक्शन, वीओडी और रेजिमेन से संबंधित टॉक्सिसिटी और बाद में इंफेक्शन (फंगल और वायरल), जीवीएचडी हो सकते हैं. लेकिन अधिकतर मामलों में समय से इलाज के जरिए इन समस्याओं को कंट्रोल किया जा सकता है.

एप्लास्टिक एनीमिया, प्राइमरी इम्यूनो डिफिशिएंसी डिजीज और थैलेसीमिया में बीएमटी शानदार रही है. ब्लड कैंसर के मामलों में भी रिलैप्स की संभावनाओं को देखते हुए खासकर हाई रिस्क बीमारियों में बीएमटी कराया जा सकता है, क्योंकि ये बीमारी को लंबे समय के लिए नियंत्रित कर सकता है.

शनिवार, 24 जून 2023

ट्राइग्लिसराइड्स: दिल की सेहत बिगाड़ने वाला साइलेंट गुनहगार

ट्राइग्लिसराइड्स: दिल की सेहत बिगाड़ने वाला साइलेंट गुनहगार 

दिल को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है कि आवश्यक बचाव किए जाएं. इसी बारे में साओल (SAAOL) हार्ट सेंटर के डायरेक्टर डॉक्टर बिमल छाजेर ने विस्तार से जानकारी दी.  हार्ट अटैक, दुनिया भर में मौत के प्रमुख कारणों में से एक है. आर्टरी में पट्टिका के पनप जाने से ऐसा होता है, जो ब्लड फ्लो में रुकावट पैदा करता है और हार्ट की मांसपेशियों को नुकसान पहुंचाता है. कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स दोनों ही फैट के माफिया के रूप में काम करते हैं जिससे हर साल लाखों लोगों की जान पर बन आती है. कई हार्ट स्पेशलिस्ट अभी भी कोलेस्ट्रॉल के लेवल को 180 मिलीग्राम / डीएल से ऊपर और ट्राइग्लिसराइड के लेवल को 160 मिलीग्राम / डीएल से ऊपर सही ठहराते हैं।

 

जल्दी डायग्नोज से हार्ट को बचाया जा सकता है: आर्टरी में जब ब्लॉकेज 50% या उससे अधिक तक पहुंच जाता है तो उसके बाद हार्ट अटैक हो सकता है. अगर आर्टरी वॉल कमजोर हैं, तो 50-70% ब्लॉकेज लेवल पर भी वॉल टूट सकती है. हैरानी की बात ये है कि अगर आर्टरी में 70 फीसदी से कम ब्लॉकेज हो तो मरीज को हार्ट अटैक से पहले इसके कोई लक्षण नहीं नजर आते. हालांकि, इन ब्लॉकेज का आसानी से पता लगाया जा सकता है. नॉन इनवेसिव टेस्ट सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी से इसका पता लग जाता है. इस टेस्ट में महज दो मिनट लगते हैं. ये टेस्ट अब भारत में बहुत ही आम है. वहीं, जब ब्लॉकेज 70-80% से अधिक हो जाती है, तो एनजाइना हो सकता है, जिसका पता लगाने के लिए स्ट्रेस टेस्ट (टीएमटी) या सीटी एंजियोग्राफी की जाती है. दिल के ब्लॉकेज का जल्दी पता लगाने से उसके कारणों को खत्म करने और दिल के दौरे को रोकने में मदद मिलती है।

 

कम वजन और फिजिकल एक्सरसाइज बेहद अहम : दिल से जुड़ी बीमारियों से बचाव के लिए सही डाइट और फिजिकल एक्सरसाइज बहुत ही महत्वपूर्ण है. हालांकि, डाइटिंग ऐसी न हो कि बिल्कुल भूखा रहा जाए. जो भी खाएं वो बैलेंस डाइट रहे. डाइट में सही मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन्स और जरूरी फैट्स हो. रेगुलर एक्सरसाइज की जाए, जिसमें कम से कम फिजिकल एक्टिविटी हो. वजन उठाने वाली एक्सरसाइज की जाए, मसल्स बनाने वाली एक्सरसाइज की जाए क्योंकि ये अधिक कैलोरी को खत्म करने में मदद करता है।

 

तेल फ्री कुकिंग: ट्राइग्लिसराइड्स, तेल का एक रूप है जो कोरोनरी आर्टरी में ब्लॉकेज के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है और इससे दिल की बीमारियां हो जाती हैं. इससे ये पता चलता है कि हमारी रोज की लाइफ में हम जितना भी तेल खाते हैं वो लंबे समय के लिहाज से हमारी सेहत को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।

 

अच्छी बात ये है कि तेल का अपना कोई स्वाद नहीं है. जी हां, यकीन करें. उदाहरण के तौर पर आप एक चम्मच तेल चखने की कोशिश करें. हम सिर्फ मसालों को पकाने या सीजन करने के लिए अपने भोजन में तेल का इस्तेमाल करते हैं, जो वास्तविक स्वाद देते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आप तेल की एक बूंद के बिना भी वैसा ही स्वाद पा सकते हैं?

 

हमने 1000 से अधिक तेल मुक्त व्यंजनों को विकसित किया है जो समान रूप से स्वादिष्ट हैं. हमारे पास पहले से ही चावल, गेहूं, दाल, फल और सब्जियों जैसे विभिन्न खाद्य पदार्थों में ट्राइग्लिसराइड्स सहित आवश्यक फैट हैं, जो हमारी बुनियादी फैट जरूरतों को पूरा करते हैं. बादाम, अखरोट, काजू और पिस्ता जैसे सूखे मेवों में 50% से अधिक तेल होता है. नारियल और मूंगफली में लगभग 40% तेल या ट्राइग्लिसराइड्स होते हैं. दुर्भाग्य से, कई हार्ट स्पेशलिस्ट गलत सलाह देते हैं, यह दावा करते हुए कि ये नट्स वसा मुक्त हैं या वे एचडीएल के स्तर को बढ़ाते हैं या ओमेगा -3 तेल होते हैं. ये डॉक्टर अक्सर ये नहीं बताते कि ये नट्स ब्लड ट्राइग्लिसराइड के स्तर को भी बढ़ाते हैं. इसलिए दिल के मरीजों को सभी नट्स खाने से बचना चाहिए. हालांकि, किशमिश, अंजीर, खजूर और खुबानी में लगभग कोई तेल नहीं होता है और शुगर की चिंता किए बिना हार्ट मरीज इसका सेवन कर सकते हैं।

 

अब लोगों को ये समझने की जरूरत है कि तेल में जो ट्राइग्लिसराइड होता है वो भी हमारे दिल की सेहत के लिए बराबर का नुकसानदायक है।  


रविवार, 18 जून 2023

हार्ट डिजीज से बचाने में अहम रोल निभाती है जागरूकता।

हार्ट डिजीज से बचाने में अहम रोल निभाती है जागरूकता।

ग्रेटर नोएडा स्थित यथार्थ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर दीपांकर वत्स ने हार्ट डिजीज से बचाव व इसके इलाज के बारे में डिटेल में समझाया है।

दरअसल हार्ट शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है और इसका एक अहम रोल है। यह धमनियों के माध्यम से ऑक्सीजन युक्त ब्लड को पंप करता है और नसों के माध्यम से डी-ऑक्सीजन युक्त ब्लड प्राप्त करता है। हाई ब्लड प्रेशर, एथेरोस्क्लेरोसिस, हाई कोलेस्ट्रॉल लेवल जैसी वजहों से हार्ट को ब्लड सर्कुलेशन बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। जब भी किसी वजह से दिल को ज्यादा कोशिश करनी पड़ती है तो धीरे-धीरे हार्ट की ताकत कम हो जाती है और हार्ट डिजीज होने का खतरा रहता है।

हार्ट डिजीज भारत में सबसे घातक बीमारियों में से एक है, जो देश में होने वाली कुल मौतों में से लगभग एक-चौथाई है।कोविड महामारी के बाद से, हार्ट डिजीज के कारण इसके केस और मृत्यु दर को नजरअंदाज किया गया है। ज्यादातर मामलों में बीमारी को रोका जा सकता है बावजूद इसके मामलों की संख्या हर दिन बढ़ रही है।

हार्ट की बीमारी बुजुर्ग आबादी को होती ही है. साथ ही खराब लाइफस्टाइल, तनावपूर्ण लाइफ मिडिल एज लोगों में कोरोनरी आर्टरी डिजीज (सीएडी) को बढ़ावा दे रही है. बहुत से लोग लक्षणों से अवेयर नहीं होते हैं, जिसके चलते बीमारी वक्त पर डायग्नोज नहीं हो पाती है. इसलिए लोगों को सलाह दी जाती है कि वे नियमित परीक्षण करवाएं, खासकर अगर किसी को डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, और हार्ट से जुड़ी समस्याएं हों तो मुश्किल हार्ट डिजीज के लिए एडवांस ट्रीटमेंट मॉड्यूल की मदद से बेहतर परिणाम आए हैं और क्वालिटी ऑफ लाइफ में भी सुधार हुआ है।

हर हार्ट मरीज के लक्षण एक जैसे नहीं होते. एंजिनल छाती का दर्द इसका सबसे आम लक्षण है. लक्षण शून्य से गंभीर तक हो सकते हैं. कुछ लोगों में अपच के समान हल्का, असहज महसूस होता है. किसी को भारीपन या जकड़न महसूस होती है, खास तौर पर चेस्ट के बीच में और फिर ये बाहों, गर्दन, जबड़े, पीठ या पेट तक फैल सकती है. सांस फूलने लगती है।

सभी के लिए हार्ट अटैक के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बहुत जरूरी है. क्योंकि सही वक्त पर रोग की पहचान होने के बाद जल्दी ट्रीटमेंट शुरू हो जाता है और उसके बेहतर रिजल्ट आते हैं. अगर सीने में भारीपन हो, असहजता हो, और सांस लेने में दिक्कत हो तो जरूरी है कि डॉक्टर को दिखाएं।

हाई ब्लड प्रेशर हार्ट डिजीज को काफी बढ़ाता है, जिससे हार्ट फेल और प्री-मैच्योर डेथ होती हैं. साथ ही डिसेबिलिटी भी हो जाती है. हालांकि, फल, सब्जियां, मछली, पोल्ट्री, नट्स ग्राम और डेयरी उत्पाद को अपनी डाइट में शामिल करके नॉर्मल ब्लड प्रेशर बनाए रखा जा सकता है. इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए एंटी ऑक्सीडेंट्स, विटामिन सी, हल्दी, आंवला, तुलसी, सब्जियां, सलाद और फल खाने चाहिए. इसके अलावा वॉक करें और उसके साथ बेसिक बॉडी स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज करें. हर रोज कम से कम आधा घंटा योग व मेडिटेशन भी करें।

हार्ट फेल को रोकने का एकमात्र और आसान तरीका मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर को बढ़ावा देने वाली लाइफस्टाइल और खान-पान की आदतों से बचना है। हार्ट फेल या कार्डियो वैस्कुलर डिजीज से पता चलता है कि आपका दिल उतना स्वस्थ नहीं है जितना होना चाहिए. इसलिए हार्ट के बेहतर कामकाज के लिए आपको इसकी देखभाल करनी चाहिए। भारत समेत ज्यादातर देशों में हार्ट डिजीज नंबर 1 किलर है। लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि स्वस्थ जीवनशैली से हम इसे रोक सकते हैं।

गुरुवार, 23 मार्च 2023

खत्म नहीं हुआ है टीबी, आपकी जानकारी का अभाव बन सकता है खतरा

खत्म नहीं हुआ है टीबी, आपकी जानकारी का अभाव बन सकता है खतरा

मेरठ – टीबी यानी ट्यूबरक्लॉसिस आज भी दुनियाभर के लिए एक बड़ी बीमारी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने टीबी को मौत का 13वां सबसे बड़ा कारण बताया है, और कोविड-19 के बाद इसे दूसरा सबसे बड़ा किलर वायरस बताया है. हालांकि, टीबी से बचा जा सकता है और इसका इलाज संभव है. भारत के आंकड़ों को देखा जाए तो यहां पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा टीबी केस हैं, जिसके चलते ये जरूरी हो जाता है कि यहां के लोगों को इसके बारे में सही जानकारी हो. 

बीएलके मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल नई दिल्ली में सेंटर फॉर चेस्ट एंड रेस्पिरेटरी डिजीज के सीनियर डायरेक्टर व एचओडी डॉक्टर संदीप नायर ने टीबी को लेकर तमाम अहम जानकारियां साझा की. भारत सरकार भी टीबी के खिलाफ लड़ रही है. सरकार का संकल्प है कि 2025 तक देश को टीबी मुक्त बनाया जाए. जबकि यूनाइटेड नेशंस के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDGs) का टारगेट 2030 तक पूरी दुनिया से टीबी का खात्मा करना है. बैक्टीरियम माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस के कारण टीबी होता है. टीबी मुख्य रूप से लंग्स यानी फेफड़ों पर असर करता है और कुछ मामलों में शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल जाता है. जब एक संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है, तो उसके पास मौजूद असंक्रमित व्यक्ति को भी टीबी होने का खतरा रहता है क्योंकि ये हवा में फैलता है. 

दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी के अंदर टीबी बैक्टीरिया होता है, लेकिन सब मामलों में ये बीमारी का रूप नहीं लेता है. जिन लोगों का इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, जैसे एचआईवी से संक्रमित लोग, कुपोषित, डायबिटीज से पीड़ित, ऐसे लोगों को टीबी होने का खतरा ज्यादा रहता है. इसके अलावा घनी आबादी, कमरों या घरों का खराब वेंटिलेशन, स्वास्थ्य की सही देखभाल नहीं होने के कारण टीबी के प्रसार की आशंका रहती है. टीबी के लक्षणखांसी, बलगम और खून के साथ खांसी, सीने में दर्द, कमजोरी, वजन घटना, बुखार और रात में पसीना आना, ये सब टीबी के लक्षण होते हैं. किसी व्यक्ति की रोजमर्रा की लाइफ कैसी है, उसका खानपान कैसा, उसके आधार टीबी की गंभीरता बढ़ती है. शारीरिक नुकसान के साथ-साथ टीबी से मरीज और परिवार भावनात्मक और आर्थिक तौर पर भी कमजोर पड़ जाता है.  

इस बीमारी में सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला अंग फेफड़े होते हैं. इसके अलावा टीबी दूसरे अंगों पर भी असर डालता है, जैसे- किडनी, रीढ़ और दिमाग. इसके अलावा टीबी से फेफड़े खराब हो जाने और सुनने की क्षमता कम होने का भी खतरा रहता है. टीबी दो तरह की होती है, लेटेन्ट और एक्ट्विव. लेटेन्ट टीबी में किसी व्यक्ति के अंदर बैक्टीरिया तो पनप जाता है लेकिन ये बीमारी का रूप नहीं लेता. जबकि एक्टिव टीबी में व्यक्ति बीमार पड़ जाता है, और ये हवा में फैलती है. कुछ मामलों में लेटेन्ट टीबी ही आगे चलकर एक्टिव टीबी में बदल जाती है, खासकर उन लोगों में जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है. टीबी के इलाज में एंटीबायोटिक दवाइयां दी जाती हैं और ये इलाज करीब 6-9 महीने तक चलता है. हालांकि, मल्टी ड्रग-प्रतिरोधी टीबी इलाज को मुश्किल बना देता है, जिसके लिए वैकल्पिक दवा की जरूरत होती है.  
 
अच्छा खाना, एक्सरसाइज और पर्याप्त आराम, टीबी से बचाव और इम्यून सिस्टम को बेहतर में जरूरी होता है. टीबी का बार-बार होना बहुत आम बात है. दरअसल, कुछ लोग जब अच्छा महसूस करने लग जाते हैं तो वो इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं जिसके चलते उन्हें फिर से टीबी हो जाती है. ऐसे में टीबी के इलाज फुल कोर्स करना जरूरी है ताकि अच्छे से रिकवरी हो सके और दोबारा टीबी के खतरे से बचा सके. मल्टी-ड्रग वाले जो मरीज होते हैं उन्हें लगातार देखभाल की जरूरत पड़ती है. हर साल लाखों लोग टीबी से संक्रमित होते हैं और अपना जीवन गंवा देते हैं. खासकर, टीबी के लिए मौजूद इलाज की जानकारी के अभाव में ऐसा काफी होता है. कुछ लोगों को लगता है कि टीबी का खात्मा हो गया, लेकिन ये गलत धारणा है. यही वजह है कि आज भी टीबी भारत के लिए एक बड़ा हेल्थ इशू है और दुनियाभर में भी. लोगों को इस बात की जानकारी होना जरूरी है कि ये बीमारी फैलती है, इसके लक्षण क्या हैं और इलाज के क्या क्या विकल्प हैं. सरकार, डॉक्टर और आम जनता के समन्वय से ही 2025 तक भारत और 2030 तक दुनिया को टीबी मुक्त करने का लक्ष्य साकार हो पाएगा।