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बुधवार, 10 दिसंबर 2025

सेंटर फॉर साइट मुरादाबाद ने शुरू की एडवांस्ड सर्जिकल रेटिना सर्विसेज, जानी-मानी रेटिना स्पेशलिस्ट डॉ. उपासना सिंह ने किया जॉइन

सेंटर फॉर साइट मुरादाबाद ने शुरू की एडवांस्ड सर्जिकल रेटिना सर्विसेज, जानी-मानी रेटिना स्पेशलिस्ट डॉ. उपासना सिंह ने किया जॉइन

मुरादाबाद : भारत की प्रमुख सुपर-स्पेशलिटी आई हॉस्पिटल चेन सेंटर फॉर साइट ने मुरादाबाद में अपनी एडवांस्ड सर्जिकल रेटिना सर्विसेज की शुरुआत की है। वेस्टर्न यूपी के लोगों को वर्ल्ड-क्लास रेटिना ट्रीटमेंट उपलब्ध कराने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। इस उपलब्धि को और खास बनाते हुए जानी-मानी विट्रियोरेटिनल सर्जन डॉ. उपासना सिंह सीनियर कंसल्टेंट – विट्रियोरेटिनल सर्विसेज के रूप में टीम में शामिल हुई हैं।


1996 में पद्मश्री प्रो. (डॉ.) महिपाल एस. सचदेव द्वारा स्थापित सेंटर फॉर साइट आज देश के सबसे विश्वसनीय आई-केयर नेटवर्क्स में से एक है, जिसके 90+ सेंटर्स, 30+ शहरों में प्रज़ेंस, 350+ विशेषज्ञ डॉक्टर और लगभग तीन दशक की क्लीनिकल एक्सीलेंस शामिल है। हर साल 15 लाख से ज़्यादा मरीज यहां मोतियाबिंद, रिफ्रैक्टिव सर्जरी, कॉर्निया, ग्लॉकोमा, रेटिना, पीडियाट्रिक ऑप्थैल्मोलॉजी, ओकुलोप्लास्टी और ऑक्युलर ऑन्कोलॉजी जैसी सेवाओं का लाभ उठाते हैं।


मुरादाबाद स्थित सेंटर फॉर साइट में शुरू हुई नई सर्जिकल रेटिना यूनिट डायबेटिक रेटिनोपैथी, रेटिनल डिटैचमेंट, एआरएमडी (ARMD), मैक्युलर होल, एपिरेटिनल मेम्ब्रेन और एडवांस्ड विट्रियोरेटिनल डिज़ीज़ जैसी कॉम्प्लेक्स स्थितियों की डायग्नोसिस व मैनेजमेंट के लिए पूरी तरह सक्षम है। नेक्स्ट-जेन डायग्नोस्टिक्स और कटिंग-एज सर्जिकल टेक्नोलॉजी के साथ अब मरीजों को स्पेशलाइज्ड रेटिना ट्रीटमेंट के लिए बड़े शहरों की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी।


सेंटर फॉर साइट मुरादाबाद की नई टीम में शामिल हो रही हैं डॉ. उपासना सिंह, जो अपनी मज़बूत अकादमिक पृष्ठभूमि, सर्जिकल स्किल्स और पेशेंट सेंट्रिक अप्रोच के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने MBBS गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज मिरज (MUHS) से किया और MS ऑप्थैल्मोलॉजी एमएलएन मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज (KGMU) से। इसके बाद उन्होंने सतगुरु नेत्र चिकित्सालय, चित्रकूट से विट्रियोरेटिनल सर्जरी में फेलोशिप पूरी की—जो भारत के सबसे प्रतिष्ठित रेटिना संस्थानों में से एक है। सेंटर फॉर साइट से जुड़ने से पहले वे ASMC प्रतापगढ़ में असिस्टेंट प्रोफेसर थीं और क्लीनिकल व सर्जिकल ट्रेनिंग में उल्लेखनीय योगदान दे चुकी हैं।


लॉन्च के अवसर पर डॉ. उपासना सिंह ने कहा, “कई रेटिनल बीमारियाँ धीरे-धीरे बढ़ती हैं और समय रहते इलाज न मिले तो परमानेंट विज़न लॉस का कारण बन सकती हैं। मुरादाबाद में सर्जिकल रेटिना सर्विसेज की शुरुआत से अब मरीजों को एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स और स्पेशलाइज्ड सर्जरी अपने ही शहर में उपलब्ध होगी। सेंटर फॉर साइट से जुड़कर मैं सम्मानित महसूस कर रही हूँ और लोगों की सेवा संवेदना, सटीकता और लेटेस्ट सर्जिकल इनोवेशन के साथ करने के लिए तत्पर हूँ।”


सेंटर फॉर साइट ग्रुप ऑफ़ आई हॉस्पिटल्स  के चेयरमैन और मेडिकल डायरेक्टर, प्रो. (डॉ.) महिपाल एस. सचदेव ने कहा, “सेंटर फॉर साइट का लक्ष्य हमेशा से उच्च-गुणवत्ता, नैतिक और सुलभ आंखों की देखभाल उपलब्ध कराना रहा है। मुरादाबाद में सर्जिकल रेटिना सर्विसेज की शुरुआत, जिसका नेतृत्व डॉ. उपासना सिंह कर रही हैं, हमारी इसी प्रतिबद्धता को मज़बूत करती है। इससे हम उन क्षेत्रों तक भी वर्ल्ड-क्लास एक्सपर्टीज़ और टेक्नोलॉजी पहुँचा पा रहे हैं जहाँ इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।”


सेंटर फॉर साइट  मुरादाबाद के मेडिकल डायरेक्टर, डॉ. ललित मोहन ने कहा, “मुरादाबाद के आई-केयर में यह एक महत्वपूर्ण माइलस्टोन है। एडवांस्ड सर्जिकल रेटिना सर्विसेज और डॉ. उपासना सिंह की विशेषज्ञता के साथ अब जटिल रेटिनल बीमारियों से जूझ रहे मरीज समय पर और स्पेशलाइज्ड ट्रीटमेंट हमारे ही शहर में प्राप्त कर सकेंगे। यह पहल हमारी कमिटमेंट को और मजबूत करती है—हर मरीज को करुणा, व्यापक देखभाल और हाई-टेक उपचार प्रदान करना।”


इस नए विकास के साथ, सेंटर फॉर साइट पूरे भारत में एडवांस्ड, नैतिक और उच्च-गुणवत्ता वाली आई-केयर सेवाएँ प्रदान करने के अपने संकल्प को फिर से दोहराता है।

बुधवार, 16 जुलाई 2025

कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी के साथ महिला स्वास्थ्य को मिल रही नई दिशा

कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी के साथ महिला स्वास्थ्य को मिल रही नई दिशाडॉ. सौरभ के. गुप्ता, डायरेक्टर एंड हेड, प्लास्टिक एंड रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, यथार्थ हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा 


महिलाओं के लिए इंटिमेट स्वास्थ्य अब सिर्फ बीमारी या इलाज तक सीमित नहीं रहा। कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी एक ऐसा नया क्षेत्र बनकर उभरा है, जो महिलाओं को न सिर्फ उनकी शरीर को लेकर आत्मविश्वास देता है, बल्कि शारीरिक परेशानी से राहत भी दिलाता है। पहले जिस बारे में बात करने से भी झिझक होती थी, आज उस पर खुलकर चर्चा हो रही है और महिलाएं बेझिझक इलाज का विकल्प चुन रही हैं।

डॉ. सौरभ के. गुप्ता, डायरेक्टर एंड हेड, प्लास्टिक एंड रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, यथार्थ हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा, बताते हैं, “हर महिला को अपने शरीर के बारे में खुलकर बात करने और सही जानकारी के आधार पर इलाज चुनने का अधिकार है। कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी महिलाओं को न सिर्फ राहत देती है, बल्कि उनके आत्मविश्वास और क्वालिटी ऑफ लाइफ को भी बेहतर बनाती है।” 


कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी में वे सर्जरी और ट्रीटमेंट शामिल हैं जो महिलाओं के प्राइवेट अंगों के लुक, आराम और फंक्शन को बेहतर बनाते हैं। इसमें वजायनोप्लास्टी (जो बच्चे के जन्म या उम्र बढ़ने के बाद योनि नलिका को कस देता है), लेबियाप्लास्टी (लैबिया के आकार को सही करना), और हायमेनोप्लास्टी (हायमेन को फिर से बनाना) जैसी सर्जरी शामिल हैं। भारत जैसे देश में जहां शादी से पहले कौमार्य को लेकर अब भी सामाजिक दबाव बना रहता है, वहां कुछ महिलाएं अपनी परिस्थितियों के अनुसार हायमेनोप्लास्टी को भी चुनती हैं। 


सिर्फ सर्जरी ही नहीं, लेज़र वजाइनल रीजुवनेशन जैसी आधुनिक तकनीकें भी अब आसानी से उपलब्ध हैं, जो टिशू की मजबूती, नमी और इलास्टिसिटी को बढ़ाने में मदद करती हैं। खासकर मेनोपॉज़ के बाद जिन महिलाओं को सूखापन या हल्की यूरिन लीकेज जैसी समस्याएं होती हैं, उनके लिए यह काफी फायदेमंद साबित हो रहा है।       

        

बच्चे के जन्म के बाद कुछ महिलाओं को योनि की ढीलापन या स्कारिंग जैसी समस्याएं होती हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित होता है। वहीं कुछ को बढ़े हुए लैबिया की वजह से चलने, साइक्लिंग करने या बैठने में भी परेशानी होती है। इन सब परेशानियों से राहत पाने के लिए महिलाएं अब कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी का सहारा ले रही हैं। यह सिर्फ सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि शारीरिक राहत और मन की संतुष्टि के लिए भी एक जरूरी कदम है। 


शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक अब महिलाएं इन ट्रीटमेंट्स को लेकर जागरूक हो रही हैं। नवविवाहिताएं, माएं, कामकाजी महिलाएं और यहां तक कि बुज़ुर्ग महिलाएं भी इस विकल्प की ओर बढ़ रही हैं। हालांकि अब भी कई महिलाएं इस विषय पर बात करने में संकोच करती हैं। इसलिए जरूरी है कि डॉक्टर सही जानकारी दें, बिना किसी जजमेंट के, ताकि महिलाएं सहज होकर सही फैसला ले सकें। 


कॉस्मेटिक गायनोकोलॉजी कोई फैशन या दिखावे की चीज़ नहीं है, यह एक निजी और महत्वपूर्ण मेडिकल ज़रूरत हो सकती है। किसी भी ट्रीटमेंट से पहले योग्य और अनुभवी सर्जन से सलाह लेना जरूरी है, ताकि सारी संभावनाओं और जोखिमों को समझकर सही निर्णय लिया जा सके। 


जैसे-जैसे जागरूकता बढ़ रही है और समाज की सोच बदल रही है, वैसे-वैसे महिलाएं भी समझ रही हैं कि अपने इंटिमेट स्वास्थ्य को लेकर मदद लेना एक सामान्य और जरूरी कदम है। आत्म-सम्मान, शारीरिक राहत और बेहतर जीवन के लिए यह एक सकारात्मक पहल है, जिसे अपनाने में अब कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

Keeping Your Heart Healthy by Reducing Triglycerides and Cholesterol

Keeping Your Heart Healthy by Reducing Triglycerides and Cholesterol

Lowering cholesterol and triglycerides can stop heart disease before it starts 

By:Dr Bimal Chhajer 

Heart disease remains one of the leading causes of death in India. Out of every 10 million deaths in the country, about a third are due to heart-related conditions. This staggering statistic calls for an urgent need for better heart health awareness. The good news is, many of these deaths are preventable, with one of the most crucial factors being the control of cholesterol levels.

 

Cholesterol is a type of fat that is essential for various body functions. However, problems arise when the levels become too high. For most adults, cholesterol levels should be below 200 mg/dL, but trouble often starts when levels exceed 150 mg/dL. Many people, and even some healthcare professionals, mistakenly believe that cholesterol levels up to 200 mg/dL are safe. This is a misconception that can cost lives. Studies show that once cholesterol surpasses 150 mg/dL, the risk of blockages in arteries increases significantly, setting the stage for heart attacks.

 

Just like we compare prices when shopping, we should aim for the best “deal” when it comes to cholesterol. If given the option, we should aim for levels below 130 mg/dL, as this minimizes the risk of blockages and heart disease. The mindset that “200 is fine” must shift, and the focus should be on keeping cholesterol as low as possible for heart health.

 

While cholesterol gets most of the attention, triglycerides are another significant player in heart disease. When triglycerides rise above 100 mg/dL, they too begin contributing to plaque buildup in the arteries. The ideal target for triglycerides is under 100 mg/dL.

 

High triglyceride levels often come from consuming excessive fats—particularly from sources like oils, dairy, and animal products. However, even seemingly healthy foods like nuts can be problematic for heart patients. Almonds, walnuts, and cashews, while nutritious, are high in fats and should be avoided by those with heart disease. It’s essential to focus on a diet low in fats and oils to reduce the risk of blockages.

 

To combat high cholesterol and triglycerides, the first step is diet modification. Reducing or eliminating animal-based products, high-fat dairy, and oils from the diet can have a profound impact. For those with a genetic predisposition to high cholesterol, these dietary changes are crucial, but medication may also be necessary to bring levels into a safe range.

 

Zero-oil cooking is often recommended for heart patients, but it’s important to ensure that hidden sources of fats, such as nuts, are also minimized. While some physicians may recommend almonds and walnuts as part of a healthy diet, these nuts contain a significant amount of fat and can contribute to higher triglyceride levels, leading to artery blockages.

 

For some individuals, high cholesterol and triglyceride levels are genetically programmed. Even with a perfect diet, the liver may continue to produce excessive cholesterol and triglycerides, increasing the risk of heart disease. In such cases, medications are essential to help reduce these levels and prevent heart attacks.

 

On this World Heart Day, the message is clear: controlling cholesterol and triglycerides is key to heart health. While reducing stress, increasing physical activity, and consuming more fruits and vegetables are all important, the most crucial step is to manage cholesterol and triglyceride levels. Aim for a cholesterol level below 130 mg/dL and triglycerides under 100 mg/dL. Avoid high-fat foods, even those that seem healthy like nuts, and if necessary, consult your doctor about medications to keep your levels in check.

 

By making these changes, we can prevent heart disease and ensure a healthier future for ourselves and our loved ones. Let’s change the way we look at heart health—starting today.

 

(The Author is Director, SAAOL Heart Centre)

सोमवार, 23 सितंबर 2024

अल्ज़ाइमर: बुजुर्गों में बढ़ती चुनौती, सही देखभाल से बेहतर हो सकती है ज़िंदगी

अल्ज़ाइमर: बुजुर्गों में बढ़ती चुनौती, सही देखभाल से बेहतर हो सकती है ज़िंदगी

सोनीपत: अल्ज़ाइमर रोग एक मस्तिष्क विकार है, जो समय के साथ गंभीर होता जाता है। यह मस्तिष्क में प्रोटीन के जमा होने के कारण होता है, जिससे मस्तिष्क का सिकुड़ना और मस्तिष्क कोशिकाओं का धीरे-धीरे मरना शुरू हो जाता है। अल्ज़ाइमर रोग सबसे सामान्य प्रकार का डिमेंशिया है, जो स्मरण शक्ति, सोचने, व्यवहार और सामाजिक कौशल में धीरे-धीरे गिरावट का कारण बनता है।


यह परिवर्तन व्यक्ति की सामान्य रूप से कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, अल्ज़ाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे सामान्य रूप है और यह 60-70% मामलों में योगदान करता है। डिमेंशिया वर्तमान में वैश्विक स्तर पर मृत्यु का सातवां प्रमुख कारण है और वृद्ध लोगों में विकलांगता और निर्भरता के प्रमुख कारणों में से एक है।


मैक्स अस्पताल, शालीमार बाग़ के निदेशक – न्यूरोलॉजी, डॉ. मनोज खनल ने कहा, "अल्ज़ाइमर रोग का समय पर निदान और उपचार इसके प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उचित देखभाल और जीवनशैली में बदलाव रोग की प्रगति को धीमा करने और मरीज की जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। हमारा लक्ष्य है कि हम रोगियों और उनके परिवारों को इस चुनौतीपूर्ण समय में हरसंभव सहायता प्रदान करें।


डॉ मनोज खनल, ट्यूलिप अस्पताल, सोनीपत में हर महीने के हर दूसरे गुरुवार को ओपीडी के लिए भी दोपहर 3 बजे से शाम 4 बजे तक उपलब्ध है।


डॉ. मनोज खनल ने कहा “अल्ज़ाइमर रोग के कई प्रकार होते हैं और इसके जोखिम कारक जैसे उम्र बढ़ने (65 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों में), परिवार में इसके इतिहास का होना, डाउन सिंड्रोम, गंभीर सिर की चोट, खराब हृदय स्वास्थ्य और दीर्घकालिक अवसाद इसके विकास में योगदान कर सकते हैं। इसके लक्षणों में स्मृति हानि, मूड और व्यक्तित्व में बदलाव, वस्तुओं को गलत जगह पर रखना, दैनिक कार्यों को पूरा करने में कठिनाई, शब्दावली में संघर्ष और सामान्य स्थानों में खो जाना शामिल हैं।


इस रोग के निदान के लिए आमतौर पर MRI या CT स्कैन जैसी इमेजिंग तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जो मस्तिष्क के विशेष क्षेत्रों में परिवर्तन का निरीक्षण करने में सहायक होते हैं। उपचार के अंतर्गत दवाओं के माध्यम से लक्षणों का प्रबंधन किया जाता है। मानसिक कार्यों को बनाए रखना, व्यवहारिक लक्षणों का प्रबंधन और रोग की प्रगति को धीमा करना इसका मुख्य उद्देश्य होता है। इसके अलावा, स्वस्थ आहार, बेहतर नींद की आदतें, और दैनिक गतिविधियों की स्थिरता मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। रोगी के लिए सुरक्षित वातावरण बनाना और उकसावे या भटकाव जैसे व्यवहारात्मक मुद्दों से निपटने के लिए विशेष तकनीकों का उपयोग करना आवश्यक होता है।


अल्ज़ाइमर रोगियों की देखभाल के लिए कई सुझाव दिए जाते हैं जैसे रोगी के साथ बहस से बचें, उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि आप उनकी मदद करने के लिए हैं। दैनिक क्रियाओं को नियमित समय पर करें और भोजन छोटे टुकड़ों में दें। स्नान के लिए सुरक्षित उपकरणों का उपयोग करें और ढीले कपड़े पहनाएं। उन गतिविधियों की योजना बनाएं जिनमें उन्हें आनंद आता हो, और उनकी दवाओं के सेवन के लिए रिमाइंडर का प्रयोग करें।

सोमवार, 18 मार्च 2024

किडनी डिजीज से बचने के लिए एक्शन की जरूरत, इलाज से बेहतर है बचाव

किडनी डिजीज से बचने के लिए एक्शन की जरूरत, इलाज से बेहतर है बचाव

फोर्टिस हॉस्पिटल वसंत कुंज में नेफ्रोलॉजी एंड किडनी ट्रांसप्लांट के प्रेसिडेंट और प्रिंसिपल डायरेक्टर के नेतृत्व में द इंडिया सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी ने क्रोनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) पर चल रही देशव्यापी स्टडीज की चौंकाने वाली रिपोर्ट साझा की. रिपोर्ट में ये सामने आया है कि हाल में सीकेडी का असर काफी तेजी से बढ़ा है. ऐसे में इस बीमारी से बचाव के लिए लोगों को अवेयर करने की जरूरत है, साथ ही उन्हें इसके इलाज के लिए उपलब्ध विकल्पों के बारे में जानकारी देने की जरूरत है.

 

पुरानी रिपोर्ट्स में ये बात थी कि सीकेडी सिर्फ 15-20 फीसदी लोगों पर ही असर डालती है लेकिन नई स्टडी से चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. देशभर में करीब 1,50,000 लोगों पर की गई इस स्टडी में 31.3% लोगों में माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया का पता चला, जो सीकेडी का शुरुआती संकेत होता है. इस स्टडी में शामिल लोगों की औसत आयु 57.6 साल थी, जिसमें से 59.1% को डायबिटीज थी. ये डेटा पुरानी रिपोर्ट्स को चुनौती देते हुए ये दर्शाता है कि सीकेडी चुनौतीपूर्ण तरीके से बढ़ रहा है और विश्वभर में ये मौत का 5वां सबसे प्रमुख कारण बनकर उभर रहा है.

 

नेफ्रोलॉजी के क्षेत्र में मशहूर डॉक्टर संजीव गुलाटी ने सीकेडी के बढ़ते पर चिंता जाहिर करते हुए खासकर उन मरीजों का जिक्र किया जो एडवांस स्टेज में पहुंच जाते हैं. स्टडी से ये भी पता चला है कि सीकेडी के बढ़ने में लाइफस्टाइल कारकों का एक अहम रोल है, लिहाजा इससे बचाव के लिए अवेयरनेस और अर्ली डिटेक्शन काफी अहम है.

 

डॉक्टर गुलाटी ने सीकेडी के बारे में जानकारियों के अभाव का भी जिक्र किया, साथ ही ये भी बताया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कैसे गलत सूचनाएं फैलाई जा रही हैं. डॉक्टर गुलाटी ने बताया कि लोगों को साइंटिफिक जानकारियां हासिल करने में चुनौतियां पेश आ रही हैं, खासकर भारतीय लोगों को. किडनी से जुड़ी बीमारियों से बचाव के लिए जरूरी है कि जानकारी के इस गैप को भरा जाए.

 

डॉक्टर गुलाटी ने कहा, ”माइक्रोएल्ब्यूमिन्यूरिया के लिए कम्यूनिटी स्क्रीनिंग नेशनल किडनी स्क्रीनिंग प्रोग्राम का हिस्सा है. डॉक्टर गुलाटी के कम्यूनिटी सर्वे से इस परीक्षण की सादगी का पता चलता है, जिसमें यूरिन डिपस्टिक का उपयोग पॉइंट-ऑफ-केयर (पीओसी) टेस्ट के रूप में किया जाता है. ये टेस्ट किडनी डैमेज से जुड़े शुरुआती संकेतों को चिन्हित करने, यूरिया और क्रिएटिनिन की वृद्धि तो पहचानने में गेम-चेंजर साबित हो सकता है.